यह संगमरमर पर उकेरा हुआ नहीं है।
यह लकड़ी पर भी उकेरा हुआ नहीं है।
प्रेम रावत: सभी कलाओं की कला
यह संगमरमर पर उकेरा हुआ नहीं है।
यह लकड़ी पर भी उकेरा हुआ नहीं है।
नहीं।
यह हर हृदय की वह गतिशीलता है, जो ज्ञान की उस भेंट से उनके जीवनकाल में स्पर्शित होगी।
एक जीवित व्यक्ति द्वारा।
(यह एक बदलाव है, है न?)
एक जीवित व्यक्ति।
मैं "पुरुष" या "स्त्री" नहीं कह रहा हूँ।
एक जीवित व्यक्ति ... आएगा और जो इसकी खोज में हैं, उन्हें ज्ञान की भेंट प्रदान करेगा।
वह व्यक्ति अपनी परिस्थितियाँ स्वयं निर्धारित करेगा - हमेशा ऐसा ही होगा - परिस्थितियों को एक जैसा बनाए रखने की कोई परंपरा नहीं है। परिस्थितियाँ बदलेंगी।
परिस्थितियाँ बदलेंगी और जो उचित होगा, वह घटित होगा।
बस हृदय स्पर्शित हो, इतना ही।
हृदय के भीतर ऐसे स्थान से आना - किसी दूसरे के हृदय तक पहुँचना।
यही सभी कलाओं की कला है।
लेकिन किसी हृदय तक पहुँचने के लिए: एक बच्चे की निष्कपटता और सभी शास्त्रों की सम्मिलित प्रज्ञा चाहिए।
समय को जीतना, किसी व्यक्ति तक पहुँचना, किसी व्यक्ति से बात करना।
एक हज़ार लोगों से बात करना, और फिर भी उन हज़ारों में से हर एक से बात करना।
यह कोई प्लास्टिक का कंबल नहीं है।
यह बहुत नाज़ुक ढंग से बुना गया है, और पूर्णता तक बुना गया है।
ये वे शब्द हैं, जहाँ शब्द - एक बार हृदय तक पहुँच जाएँ - झर जाते हैं।
फिर उनका कोई अर्थ नहीं रह जाता।
बहुत बड़ा अंतर।
हर इंसान की ऐसी आवश्यकता, जो इतनी मौलिक और वास्तविक है।
भाषा मायने नहीं रखती।
संस्कृति मायने नहीं रखती।
वह कौन है, कहाँ है, क्या नहीं है: मायने नहीं रखता।
यही ज्ञान की परंपरा है - जागृत होना।
इसे अपना मार्ग बना लो।