मेरे सामने रखा यह कटोरा
खाली हो, ऐसा ज़रूरी नहीं है...

यह नदी जो बह रही है, इसमें इतना कुछ है जो आँखों से देखे जा सकने वाले से कहीं-कहीं अधिक है।

क्योंकि ऊपर से यह तो बस बहते हुए पानी जैसा दिखता है。

लेकिन किसी ने मुझे सिखाया。
किसी ने मुझे दिखाया, 'इस कटोरे को लो, इसे इस नदी में डुबोओ, बाहर निकालो, और ऐसा करते रहो; एक दिन तुम्हारा कटोरा शान्ति के सोने से भर जाएगा।'

मैं यही करता हूँ।

तो बहुत से लोग हैं。
यह नदी हमारे सामने से लगातार बहती जा रही है。
कुछ बस नदी को देखते हैं और कहते हैं, 'बहुत सुंदर।' कुछ नदी को देखते हैं और कहते हैं, 'काश मैं इस पर स्कीइंग कर सकता।'

कुछ कहते हैं, 'काश मैं इस पर अपनी नाव चला सकता।' कुछ इसे देखते हैं और कहते हैं, 'तुम्हें पता है, मैं अपने पैरों के अंगूठे इसमें डाल सकता हूँ, मुझे थोड़ी गर्मी लग रही है, मैं अपने पैरों के अंगूठे नदी में डालूँगा।'

क्या यह अच्छा है? क्या यह बुरा है?

मैं कोई निर्णय नहीं देने वाला, लेकिन, इस आँख के देख सकने से अधिक, किसी ने मुझे वह धन दिखाया है जो इस नदी के साथ बह रहा है。

और वह कटोरा जो मुझे दिया गया।

अब सब कुछ समझ में आता है....

प्रेम रावत – लंदन, 2004